भारतीय कॉफी की गाथा सन 1600 ए.डी में पौराणिक धार्मिक संत बाबा बुदान द्वारा कर्नाटक के ‘बाबा बूदान गिरीज़’ के अपने आश्रम के आँगन में ‘मोचा’ के ‘सात बीजों’ के रोपण से प्रारंभ हुई। ये पौधे काफी समय तक बागान कौतूहल के रुप में बने रहे और धीरे-धीरे आँगन में फैलने लगे।
18 वीं शताब्दीा के दौरान कॉफी की वाणिज्यिक खेती प्रारंभ हुई तथा उन ब्रिटिश उद्यमियों की सफलता के लिए धन्यवाद दिया जाना है जिन्होंने कॉफी को दक्षिण भारत के इस प्रतिकूल वन भूभाग लाने का कार्य किया।
उसके बाद से भारतीय कॉफी उद्योग तेजी से आगे बढ़ा और विश्व के कॉफी मानचित्र में एक अनोखी पहचान बनाई है।
भारत में कॉफी पूर्वी एवं पश्चिमी घाट के संवेदनशील पर्यावरणिक क्षेत्र में छायादार पेडों के नीचे उपजाई जाती है। यह विश्व के 25 मह्त्वपूर्ण जैवविविधता के क्षेत्रों में से एक है। कॉफी न केवल इस क्षेत्र की अनोखी जैवविविधता को बनाए रखने के लिए सहायता प्रदान करती है बल्कि सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों के सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए भी अपना योगदान देती है।