प्लांटर
सस्यवैज्ञानिक प्रथाएँ
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• बीज केवल प्राधिकृत स्रोतों से ही प्राप्त करें।
• कॉफ़ी बेरी बोरर प्रभावित क्षेत्रों से बीज प्राप्त न करें।
• बीज प्राप्त होते ही उन्हें बोएं, क्योंकि उनकी जीवनक्षमता कम है।
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कॉफ़ी बागानों में मृदा एवं नमी का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मृदा क्षरण निवारण :
• खड़े ढालवाँ को कम करने के लिए प्लांटिंग/टेरसिंग की रूपरेखा बनाएँ।
• ढालवाँ धरती पर उपयुक्त अंतराल के साथ वेटिवर, पास्पलम जैसे मृदायोजक तिनके उपजाएँ।
मृदा संरक्षण से संबंधित समस्याएँ :
• मानसून काल : ढालवाँ क्षेत्रों में मृदा के क्षरण की संभावना अधिक है।
• वर्षाकालोत्तर समय : नमी के अभाव (यानी सूखा) से कॉफ़ी की साधारण संवृद्धि प्रभावित हो सकती है।
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• कॉफ़ी उपजाने के प्रारंभिक काल में क्रोटलेरिया, टेरफोरसिया, लोबिया, कुलथी जैसे फलीदार हरी खादकारी फसल उगाए जाएँ।
• पुष्पण से पूर्व मृदा से जुडने के लिए मई-जून के महीनों में हरी खादकारी फसल उगाए जाने चाहिए।
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• रोपण के प्रथम वर्ष (अक्तूबर-नवंबर) के दौरान पौधे के नीचे की खुदाई को ढककर रखें। हालांकि, ढालवाँ क्षेत्रों पर खुदाई से बचें तथा केवल हाथों से भौतिक निराई करें।
• रोपण के बाद दूसरे से चौथे वर्ष तक मृदा की नमी के संरक्षण के लिए मानसूनोत्तर (अक्तूबर-नवंबर) समय के दौरान घिसाई न करें । लेकिन ढालवाँ क्षेत्रों पर घिसाई से बचें।
• संस्थापित क्षेत्रों में खुदाई, घिसाई जैसी मृदा-जुताई का प्रयास नहीं करना चाहिए।
• संस्थापित क्षेत्रों में मृदा एवं नमी के संरक्षण के लिए ढालवाँ क्षेत्रों में परिस्थिति के अनुसार पालने गड्ढे या खाई खोदें।
• गर्मी के मौसम के दौरान नमी के संरक्षण के लिए छोटे नरम पौधों को सूखे पत्तों से ढाँकें।
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• रोपण के प्राथमिक चरणों के दौरान पौधे के नीचे की खुदाई को ढकना, घिसाई, पौधे को लोबिया, कुलथी आदि से ढकना इत्यादि पारंपरिक प्रयास घास-पात फैलाव को रोकने में सहायक होगा।
• संस्थापित क्षेत्रों में मानसून-पूर्व निराई स्प्रे, मध्य-मानसून निराई तथा मानसूनोत्तर निराई स्प्रे आदि समेकित घास-पात नियंत्रण उपायों से संतोषजनक घास-पात नियंत्रण प्राप्त होगा।
• रासायनिक निराई के समय पर बारी-बारी से या तो वीडिसाइड ग्रामोक्ज़ोन से संपर्क करें या ग्लाइसेल या राउंड-अप जैसे निर्धारित वीडिसाइड्स का उपयोग करें।
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• अल्पकालीन लाभ के लिए विवेकहीन पेड़-कटाई से बचें।
• अस्थाई डड़ाप्स के साथ द्वि-स्तरीय छाया की व्यवस्था तथा फिकस, अलबिज़िया, कटहल जैसे सुस्थिर छायादार पेड़ों का अनुरक्षण करें।
• उन्नतांश के क्षेत्र में कॉफ़ी के उगाने के बाद अस्थाई छायादार पेड़ों को निकाला जा सकता है।
• कॉफ़ी झाड़ियों की क्षति कम करने के लिए 3-4 सालों में एक बार के बदले प्रति वर्ष नियमित रूप से छाया के प्रबंधन की व्यवस्था करें।
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• प्रति वर्ष फसल की कमी कम करने तथा कीटाणुओं एवं रोग नियंत्रण के प्रभावी प्रबंधन के क्रियान्वयन के लिए समुचित बुश प्रबंधन अनिवार्य है।
• पौधों के संरक्षण बनाए रखने के लिए प्रति वर्ष फसल प्राप्ति के बाद हल्की छंटाई अनिवार्य है।
• जून-जुलाई के दौरान पौधों की निगरानी, केन्द्रीकरण एवं डीसकरिंग करें तथा यदि आवश्यक हो तो सितंबर-अक्तूबर के दौरान भी करने से सशक्त फसलदार पेड़ को बनाए रखने में सहायता प्राप्त होगी।
• रोग अनुमानित/ मंद पैदावार पौधों को जीवंत बनाने से एकरूपता एवं उत्पादन-वृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है।
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• कॉफ़ी के पोषण प्रबंधन के लिए चूनीकरण (लाइमिंग) द्वारा सापेक्ष पीएच बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। अगर समुचित पीएच का अनुरक्षण नहीं किया गया तो पौधा प्रभावी रूप से अनुप्रयुक्त खाद का लाभ प्राप्त नहीं कर सकता।
• चूनीकरण व खाद अनुप्रयोग के लिए 2-3 वर्षों के दौरान एक बार मृदा-परीक्षण करना अनिवार्य है।
• कृषीय चूना विश्लेषण के लिए 80% कैल्शियम कार्बोनेट का उपयोग करें। नवंबर माह चूनीकरण के लिए उत्तम समय है। कभी-कभी डोलोमाइट चूने का अनुप्रयोग लाभकारी होगा।
• एफ़वाईएम जैसे प्रभावी जैव खादों या जैव खाद मिश्रण (कम्पोस्ट) 5 टन्स/हेक्टर का प्रयोग करें। दो सालों में एक बार अनुप्रयुक्त खादों के बेहत्तर प्रयोग से मृदा की उर्वरता में सुधार होगा।
• ड्रिप सर्किल पद्धति अपनाते हुए निर्धारित मात्रा के खादों का प्रयोग एक वर्ष में तीन चरणों (मानसूनोत्तर, मानसून-पूर्व व मानसूनोत्तर) में किया जाना चाहिए। ढालवाँ क्षेत्रों में, ड्रिप सर्किल के ऊपरी अर्ध भाग में खादों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
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• कॉफ़ी पर आक्रमण करने वाले कीटाणुओं में व्हाइट स्टेम बोरर (क्साइलोट्रेकस क्वाड्राइप्स), कॉफ़ी बेरी बोरर (हाइपोथेनमस हांपे), शॉट होल बोरर (क्साइलोसेंड्रस कोंपाक्टस), सूत्रकृमिकीट तथा मीलीबग्स व ग्रीन स्केल्स जैसे चूषक कीटाणुओं का आर्थिक महत्व है।
• कॉफ़ी के रोगों में कॉफ़ी पत्ता किट्ट (हिमेलिया वास्टरिक्स), काला रोट (कोलेरोगा नोक्सिया) तथा जड़ संबंधी रोग फसल हानी के मुख्य कारण हैं।
• दक्षिण अमेरिकी देशों के समान भारत में भी कॉफ़ी छायादार पेड़ों के निचे उगाई जाती है जो कॉफ़ी पर्यावरण व्यवस्था को अतिसूक्ष्म मौसम परिवर्तन भी अत्यंत प्रभावित करता है।
• कॉफ़ी के कीटाणुओं एवं रोगों के कारण उत्पादन निम्नतम आर्थिक सीमा पर पहुँच सकता है, इसलिए इससे बचने के लिए सावधानी से कीटाणुओं एवं रोगों के प्रभाव का पूर्वानुमान व निरंतर निगरानी, अधिकतम ऊपरी छाया, कॉफ़ी बुशों की छंटाई, स्वदेशी प्राकृतिक उपायों का संरक्षण व आवर्धन, कीटाणुओं के देशी प्राकृतिक प्रतिरोधक एवं आवश्यकतानुसार जैव कीटनाशक/कीटनाशक/फफूँदनाशक का प्रयोग आदि समेकित प्रबंधन योजनाओं का प्रयोग किया जाता है।
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कीटाणु का नाम
व लैटीन नाम
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लक्षण व क्षति
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नियंत्रण उपाय
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व्हाइट स्टेम बोरर (क्साइलोट्रेकस क्वाड्राइप्स)
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अरेबिका कॉफ़ी के विरोधी कीटाणु
प्रभावित पौधों के तने पर बाहरी मेड़ दिखाई पड़ता है। प्रभावित पौधों के पत्ते पीले होकर झड़ जाते हैं।
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अधिकतम छाया बनाए रखें। पुष्पण अवधि (मार्च-सितंबर) से पूर्व प्रभावित पौधों को ढूंढकर उखाड़ें तथा जलाएँ।
मूल तने के प्रभावित छाल को निकालें तथा रस्सी दास्ताने या नारियल के भूसे से गाढ़ा प्राइमरी लगाएँ।
मूल तने पर 10% चूना घोल (200 लिटर पानी में 20 किलो स्प्रे लाइम एवं 100 मि.लि फेवीकोल डीडीएल) लगाएँ तथा पुष्पण अवधि से पूर्व गाढ़ा प्राइमरी लगाएँ।
अधिक प्रभावित ब्लोक्स पर फेरोमोन ट्राप्स लगाएँ (25 ट्राप्स/ हेक्टर)
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कॉफ़ी बेरी बोरर (हाइपोथेनमस हांपे)
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दाने के सिरे पर पिनहोल, कीटे की उपस्थिति का संकेत देता है।
दाना अधिक संक्रमित हो तो दो या उससे अधिक पिनहोल्स देखे जा सकते हैं।
क्षति या द्वितीय संक्रमण के कारण प्रभावित दाना गिर भी सकता है।
अत्यधिक प्रभावित होने से अधिक मात्रा में फसल नष्ट हो सकता है।
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समय पर स्वच्छ फसल कटाई। दानों के गिरने से बचने के लिए चारपाई का उपयोग करें।
बेमौसम दानों एवं सिल्लों को निकालें
सूखी कॉफ़ी प्राप्त करने के लिए निर्धारित नमी स्तर प्रदान करने के लिए फसलोत्तर अवधि के दौरान ब्रोका ट्राप्स (60/ह.) डालें।
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शॉट होल बोरर (क्साइलोसेंड्रस कोंपाक्टस)
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शॉट होल के साथ मुरझाए या सूखे डाल कीटाणु की उपस्थिति का संकेत देता है।
प्रभावित डाल जल्दी सूख जाते हैं।
बचे हुए पत्ते प्रभावित होने से पहले ही गिर जाते हैं।
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प्रभावित टहनियों को होल के 5-7.5 से.मी नीचे से काटें।
गर्मी के मौसम के दौरान सभी अनावश्यक/प्रभावित टहनियाँ व अन्य वस्तुएँ निकालकर जलाएँ।
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मीलीबग्स (प्लानोकोकस सिट्री व पी.लीलाकिनस)
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मीलीबग्स पौधों के जोड, नोक, दाने, नरम टहनियाँ, पत्ते एवं जड़ पर आक्रमण करते हैं जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं तथा फसल नष्ट हो जाते हैं।
मीलीबग्स द्वारा प्रभावित पौधों में चींटियों की सक्रियता भी देखी जा सकती है।
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छायादार पेड़ के मूल पर 1.5% क्विनाल्फोस या 2% मीथाइल पेरथियोन या 5% मेलथियोन का चूरा डालने पर चींटियों को रोका जा सकता है।
चींटियों के नीड निकालें, घास-पात निकालकर जलाएँ।
प्रभावित भागों में क्विनाल्फोस 25 ईसी या फ़ेनिट्रोथियोन 50 ईसी @ प्रति 300 मि.ली या फ़ेंथियोन 1000 @ प्रति 150 मि.ली या 200 मि.ली वेटिंग कारक के साथ 200 लीटर्स जल में 4 लीटर्स मिट्टी के तेल का मिश्रित स्प्रे करें।
पी.सिट्री के विरुद्ध पेरासिटोइड डाक्टाइलोपी या प्रेडेटर क्रिप्टोलीमस मोंट्रोसीरी का प्रयोग प्रयोग करें।
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ग्रीन स्केल
(कोकस विरिडिस)
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यह पुराने पौधों को कमजोर तथा नर्सरी पौधों को नष्ट कर देता है।
इसके द्वारा पत्तों पर शहद बूंद द्वारा फिल्म-सा बनाया जाता है और उस पर ब्लैक फफूँद पैदा हो जाता है।
प्रभावित पौधों में चींटियों की सक्रियता भी देखी जा सकती है।
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अधिकतम छाया बनाए रखें।पेड़ के मूल पर 1.5% क्विनाल्फोस या 2% मीथाइल पेरथियोन या 5% मेलथियोन का चूरा डालकर चींटियों को रोकें। चींटियों के नीड निकालें, घास-पात निकालकर जलाएँ।
प्रभावित भागों में क्विनाल्फोस 25 ईसी के 120 मि.ली या फ़ेंथियोन1000 के 80 मि.ली या डाईमीथोएट 30ईसी के 170 मि.ली या 200 मि.ली वेटिंग कारक में 200 लीटर्स जल के साथ फ़ेनिट्रोथियोन 50 ईसी के 100 मि.ली स्प्रे करें।
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नेमटोड्स (प्राटाइलेंकस केफ़े)
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प्रभावित पौधे दुबले-पतले हो जाते हैं तथा झुकते हैं।
पुराने पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं तथा शेष पत्ते विकृत, क्लोरोटिक व पंगु होकर तने से सटकर रह जाते हैं जिससे पौधा गुच्छ जैसा दिखाई देता है।
प्रभावित पौधों के तने पतले हो जाते हैं तथा इससे फसल के समर्थन के लिए पर्याप्त पत्ते प्रदान करने में असमर्थ होते हैं।
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नर्सरी मिश्रित तैयार करते समय गर्मी के मौसम में मिट्टी को खोदकर निकालें तथा पूरी जंगली मिट्टी सुखाएँ।
मुख्य क्षेत्र के प्रभावित पौधों को उखाड़कर जलाएँ तथा प्रभावित मिट्टी को खोदें और एक वर्ष तक सूखने दें।
इस बात पर ध्यान दें कि खोदे गए गड्ढे घास-पात एवं रोबस्टा रूटस्टोक के प्रभावित अरेबिका प्रतिरोपित पौधों से मुक्त रहें।
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रोग का नाम
व लैटीन नाम
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लक्षण व क्षति
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नियंत्रण उपाय
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कॉफ़ी पत्ता किट्ट (हिमेलिया वास्टरिक्स)
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पत्तों के निम्न भाग पर यूरेडोस्पोर्स चूरे के साथ पीले से नारंगी बिन्दुएँ जनवरी से अप्रैल तक नशापाती के रूप में टेलियोस्पोर्स
यदि समय पर नियंत्रण उपाय न लिया गया तो तीव्र आक्रमण से हरतहीनता, डाई-बैक व कमजोरी तथा 70% तक फसल नष्ट हो सकता है।
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अधिकतम छाया बनाए रखें। मानसून-पूर्व (मई-जून) तथा मानसूनोत्तर (सितंबर-अक्तूबर) अवधि के दौरान 0.5% बोरड़क्स मिश्रण स्प्रे करें या मानसून-पूर्व अवधि के दौरान 0.5% बोरड़क्स मिश्रण तथा मानसूनोत्तर अवधि के दौरान बेयलटोन 25 डब्ल्यू पी @ 0.02 ए.आई (160जी/बेरल) स्प्रे करें।
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काला रोट (कोलेरोगा नोक्सिया डोंक )
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उच्च आर्द्रता एवं बहते कोहरे वाले स्थानिक क्षेत्र में मानसून के समय पर पौधे इससे प्रभावित होते हैं।
नरम पत्ते, दाने व अंकुरों के काले होना तथा निरंतर सड़ना।
प्रभावित पत्ते टहनी से अलग होकर पतले फफूँदे रेशों पर लटक जाते हैं।
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स्थानिक क्षेत्र में पतली छाया बनाए रखें तथा बुश पर रोशनी फैलाने के लिए अधिक छायादार पेड़ों के पत्ते निकालें।
बुशों के समुचित परिचालन व केंद्रण अपनाएँ तथा बढ़ती हुई नमी कम करने के लिए समुचित नाले बनवाएँ।
दक्षिण-पश्चिम मानसून के प्रारंभ होने से पूर्व 1.0% बोर्डक्स मिश्रण स्प्रे करें।
यदि रोग का प्रभाव पाया गया है तो प्रभावित पत्तों व दाने को निकालकर जलाएँ तथा मानसून के अंतराल में बेविस्टिन 0.03% ए.आई. (120ग्राम/200 लि.जल) स्प्रे करें।
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जड़ संबंधी रोग
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कॉफ़ी को प्रभावित करने वाले चार जड़-संबंधी रोग हैं जैसे ब्राउन, लाल, काले जड़ रोग तथा सेंटावेरी रोग।
इन सभी चारों रोगों में से ब्राउन, लाल, काले जड़ रोगों के वायविक लक्षण समान हैं जिसमें प्रभावित पौधों के पत्ते धीरे-धीरे पीले होकर पतले ही जाते हैं, उसके बाद कमज़ोर होकर गिर जाते हैं।
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ब्राउन, लाल, काले जड़ रोग प्रबंधन:
प्रभावित पौधों को 60 से.मी गहरे एवं 30 से.मी चौड़े गड्ढों में अलग रखें।
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ब्राउन जड़ रोग
(फोम्स नोक्सियस कॉर्नर)
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ब्राउन जड़ रोग ‘स्टंप रोट’ के नाम से भी जाना जाता है जो बगानों के छायादार पेड़ों के जड़ने वाले टहनियों से संबद्ध है। जड़ों के द्वारा ही रोग फ़ेल जाता है। रोट के आंतरिक भाग में काले ब्राउन से काली तरंगित लाइनें दिखती हैं।
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प्रभावित पौधों को जड़ के साथ उखाड़ें और उन्हें जलाएँ।
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लाल जड़ रोग (पोरिया हाइपोलेटीरिया बेर्क)
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सामान्यतया लाल जड़ रोग से सिल्वर ऑक या सिज़ीगियम (नेरले) जैसे छायादार पेड़ प्रभावित होते हैं, बाद में समीपस्थ कॉफ़ी पौधों पर फैलता है। जड़ सिस्टम में मिट्टी व ग्रेवल की लाल परत दिखाई पड़ती है। रिज़ोमोर्फ लाल रंग में दिखाई पड़ता है।
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प्रत्येक गड्ढे में 1-2 किलो चूना डालें तथा उगाने के छह माह पूर्व तक उसे परती धरती-सा रखें।
आगे जड़ रोगों से बचने के लिए जब भी कोई पेड़ रोगग्रस्त लगता है तब उसे तनासहित उखाड़ें।
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काला जड़ रोग (रोसेलीनिया एक्रूआटा पेच)
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काले जड़ रोग के दौरान प्रभावित जड़ों में फफूंदी रिज़ोमोर्फ या काले वूली माइसीलियम दिखाई देता है। धरती के समीपस्थ जड़ भागों में पेल्लेट जैसे फ्रक्टेशन के साथ फैन-जैसे फंगल परत दिखाई देता है।
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मुरझाने की प्रारंभिक स्थिति में बावीस्टिन 0.4 % @ 3 लि/प्लांट (24 ग्राम/3 लि जल) या विटावैक्स 75 डब्ल्यू पी 0.3% @ 3 लि/प्लांट के साथ मिट्टी भिगोएँ।
रोग का प्रभाव कम करने के लिए प्रभावित स्थानों पर जैवनियंत्रण कारक ट्राइकोडेर्मा का अनुप्रयोग उपयोगी सिद्ध होगा।
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सेंटावेरी जड़ रोग (फ़्युसेरियम ओक्सिफ़ोरम एफ़ वि. कॉफ़ी)
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सेंटावेरी जड़ रोग से पौधे तुरंत मुरझा जाते हैं, पत्तों के पीले होने के बाद झाड जाते हैं तथा पौधे के वायविक भाग नष्ट हो जाते हैं।
जड़ का दूसरा भाग ब्राउन से हल्के गुलाबी रंग का हो जाता है।
धरती के समीपस्थ जड़ भाग के तने की छाल निकालने पर रंगा परिवर्तन स्पष्ट होगा।
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सेंटावेरी जड़ रोग प्रबंधन :
नष्ट या नष्ट होने वाले पौधों को उखाड़ें तथा उन्हें जलाएँ।
पर्याप्त ऊपरी छाया बनाए रखें।
मृदा उर्वरता सुधारने के लिए प्रति पौधा 10-15 किलो उत्तम जैव खाद डालें।
पौधों की जीवंतता बनाए रखने के लिए संतुलित पोषकों का प्रयोग करें तथा उत्तम सांस्कृतिक प्रचालन अपनाएँ।
प्रभावित खंडों के रोपण या पुन:रोपण के लिए प्रतिरोपित पौधों (रोबस्टा रूटस्टोक पर अरेबिका) का उपयोग करें।
मुरझाने की प्रारंभिक स्थिति में बावीस्टिन 0.4 % @ 3 लि/प्लांट (24 ग्राम/3 लि जल) या विटावैक्स 75 डब्ल्यू पी 0.3% @ 3 लि/प्लांट के साथ मिट्टी भिगोएँ।
रोग का प्रभाव कम करने के लिए प्रभावित स्थानों पर जैवनियंत्रण कारक ट्राइकोडेर्मा का अनुप्रयोग उपयोगी सिद्ध होगा।
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रोग
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लक्षण
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नियंत्रण उपाय
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डाई-बैक (कलट्रोटिचम ग्लियोस्फ़ोरोइड्स पेंज़)
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हरे पेड़ के किसी भी पत्ते का पीलापन या जड़ना, पीलापन, जोड़ों का अपक्षय, नोक के पास इंटरनोड्स आदि इसका लक्षण है । टहनी सूखना एवं पत्तारहित होना, सिरे की तरफ मुरझाना तथा शीर्षारंभी क्षय दिखाई देता है। प्रभावित शाखाओं की कलियाँ खिलने में असमर्थ ही जाती हैं।
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अत्यधिक प्रभावित पौधों को फरवरी - मार्च के दौरान काटें।
फरवरी-मार्च (पूर्व-पुष्पण), अप्रैल-मई (मानसून-पूर्व) तथा सितंबर-अक्तूबर (मानसूनोत्तर) के दौरान पौधों के संरक्षण के लिए 0.5% बोर्डक्स मिश्रण स्प्रे करें।
ऊपर पर्याप्त छाया तथा पत्ते बनाए रखें तथा गर्मी के मौसम में मृदा की नमी बनाए रखने के लिए पौधों के नीचले भाग को घास-पात से ढककर रखें।
पौधों को सशक्त करने के लिए संतुलित पोषक तत्वों का प्रयोग करें।
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नेमटोड्स
(प्राटाइलेंकस केफ़े)
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प्रभावित पौधे दुबले-पतले हो जाते हैं तथा झुकते हैं। पुराने पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं तथा शेष पत्ते विकृत, क्लोरोटिक व पंगु होकर तने से सटकर रह जाते हैं जिससे पौधा गुच्छ जैसा दिखाई देता है। प्रभावित पौधों के तने पतले हो जाते हैं तथा इससे फसल के समर्थन के लिए पर्याप्त पत्ते प्रदान करने में असमर्थ होते हैं।
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नर्सरी मिश्रित तैयार करते समय गर्मी के मौसम में मिट्टी को खोदकर निकालें तथा पूरी जंगली मिट्टी सुखाएँ।
मुख्य क्षेत्र के प्रभावित पौधों को उखाड़कर जलाएँ तथा प्रभावित मिट्टी को खोदें और एक वर्ष तक सूखने दें।
इस बात पर ध्यान दें कि खोदे गए गड्ढे घास-पात एवं रोबस्टा रूटस्टोक के प्रभावित अरेबिका प्रतिरोपित पौधों से मुक्त रहें।
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• प्लांटेशन/पार्चमेंट कॉफ़ी ’ के उत्पादन के लिए आर्द्र (वेट) पद्धति या ‘ चेरी कॉफ़ी ’ के लिए निर्जल (ड्राई) पद्धति द्वारा कॉफ़ी की संसाधन किया जाता है।
• उपरोक्त दोनों प्रकार की कॉफ़ियाँ तैयार करने के लिए बिल्कुल पके हुए फलों को लेना अनिवार्य है।
• अधिक पके हुए या हरे (कच्चे) दाने लेने से संसाधन के बाद निम्न कप गुणता की कॉफ़ी प्राप्त होती है। यदि किसी भी कारण से कॉफ़ी यथा निर्धारित उपजी नहीं है तो जब पक जाती है तब अधिक पके हुए व हरे फलों को छाँटकर अलग से ‘चेरी’ के रूप में संसाधित करें।
• पल्पर,धुलाई मशीन, टंकी, वैट,ट्रेस आदि हमेशा साफ़ रखें।
• जिस दिन फल निकालता है उसी दिन उन्हें पल्प करें।
• फलों की ढेर अधिक दिन न रखें तथा विलंबित पल्पिंग से बचें।
• कॉफ़ी की धुलाई के लिए साफ़ पानी का उपयोग करें।
• कॉफ़ी की गुणता प्रवर्धन के लिए पार्चमेंट को एक रात भिगोकर रखें।
• प्रत्येक दिन काम के बाद पल्पर मशीन, वैट आदि साफ़ करें।
• पार्चमेंट सुखाते समय सभी पल्पर कट्स, अनावृत दाने,ब्लैक्स तथा अन्य क्षतिग्रस्त दानों को छाँटकर निकालें।
• सबसे पहले, बचे हुए पानी निकालने के लिए सूखे पार्चमेंट कॉफ़ी वायर मेश ट्रे में डालें।
• उसके बाद साफ,टाइल्ड या कोंक्रीट के सुखाने वाले यार्ड पर कॉफ़ी सुखाएँ।
• पुन:नमी से बचाने के लिए रात्रिकाल पर कॉफ़ी ढककर रखें।
• निर्धारित परीक्षण भार एवं नमी मानकों के अनुसार कॉफ़ी सुखाएँ।
• कॉफ़ी, साफ गन्नी बैगों में, नमीमुक्त, सदा वायुप्रवाही व साफ़ गोदामों में भंडारित करें। गोदाम के फ़र्श पर लकड़ी के तख़्ते डालें।
• कॉफ़ी, खाद, कीटाणुनाशक एवं ऐसे अन्य वस्तुओं के साथ भंडारित न करें, जिससे कॉफ़ी के दाने संदूषित हो सकते हैं।
• कॉफ़ी,अधिक समय भंडारित किए बिना शीघ्र ही क्यूरिंग कार्य के लिए भेजें।
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भारत में जैव कॉफ़ी
केवल असंश्लेषी पोषक एवं पौधा संरक्षण पद्धति के प्रयोग द्वारा कृषि संस्कृति के अनुप्रयोग के माध्यम से मृदा संवर्धन, अनुकूलन व उर्वरता के संरक्षण एवं प्रवर्धन की सहायता प्रदान करने वाले प्रबंधन प्रयासों से निर्मित कॉफ़ी को ही जैव कॉफ़ी कहा जाता है। लेकिन कई कॉफ़ी निर्माताओं के द्वारा विश्व के लगभग 40 देशों में जैव कॉफ़ी का उत्पादन किया जाता है जिसका अधिकतम शेयर पेरु, एथियोपिया एवं मेक्सिको से आता है। जैव कॉफ़ी का उपभोग मुख्यतया यूरोप, यू.एस तथा जापान में किया जाता है। यू.एस के जैव व्यापार संगठन के अनुसार 2006 में जैव कॉफ़ी की वैश्विक बिक्री 67,000 मेट्रिक टन के रेकॉर्ड तक पहुँच गई थी जो 2003 में निर्यातित लगभग 42,000 मेट्रिक टन से 56% अधिक थी। 2006 में केवल यू.एस में जैव कॉफ़ी की बिक्री की राशि लगभग $ 110 मिलियन थी जो विगत वर्ष की बिक्री से 24% अधिक थी। आजकल नियमित, कैफ़ीन रहित, फ्लैवरयुक्त व इंस्टेंट कॉफ़ी के रूप में आइसक्रीम्स, योघर्ट, सोडास, कैंडीस एवं चॉकलेट आवरित बीन्स जैसे अन्य खाद्य पदार्थों के साथ-साथ बाज़ार में जैव कॉफ़ी उत्पाद, उपलब्ध होते हैं।
संश्लेषी जैव-रसायनिक के बिना जैव कॉफ़ी उपजाते हैं, मान्यता-प्राप्त प्रमाणन एजेंसी के मान्य प्रमाणन के बिना की गई यह निष्क्रिय प्रक्रिया जैव कॉफ़ी के रूप में स्वीकारने के लिए पर्याप्त नहीं है।
भारत में जैव कॉफ़ी उत्पाद का कार्यक्षेत्र
भारत में जैव कॉफ़ी उत्पादन के लिए अत्यधिक संभावना है, क्योंकि किसी भी अन्य कॉफ़ी उत्पादक देश के समान यहाँ भी परिस्थिति जैव कॉफ़ी के लिए अनुकूल है। भारत में जैव कॉफ़ी के कुछ प्राकृतिक लाभ निम्न हैं:
i) भारत में नित्यहरित फलीदार एवं फलीरहित छायादार पेड़ों के द्वि-स्तरीय मिश्रित छत्रछाया के अधीन अति उर्वरक जंगली मृदा में कॉफ़ी उपजी जाती है। छाया के अधीन उपजाने के अनेक लाभ होते हैं। छायादार पेड़ अनेक प्रकार के पक्षियों एवं कीटाणुओं/रोगों के शत्रुओं का प्राकृतिक वासस्थल प्रदान करते हैं जो मृदा क्षरण कम करता है तथा पतझड़ के रूप में गहरी मृदा के पोषक चक्रण द्वारा कॉफ़ी मृदा में उर्वरता पैदा करते हैं और अंतत: परिवर्ती मौसमी परिस्थितियों से कॉफ़ी झड़ियों का संरक्षण भी करते हैं।
ii) विस्तृत मात्रा के अधिकतम छोटे जोतों में मवेशी खाद, कंपोस्टिंग, मैनुअल निराई आदि पारंपरिक कृषि प्रथाओं का प्रयोग किया जाता है।
iii) मैनुअल निराई, छाया नियतन एवं मृदा संरक्षण उपाय जैसे कामगार प्रोत्साहक परिचालन के लिए पर्याप्त कुशलतायुक्त श्रमशक्ति की उपलब्धता।
iv) भारत के कॉफ़ी बागानों में प्रचलित उद्यान कृषि प्रथाओं को विश्व में सर्वोत्तम माना जाता है, जो सूक्ष्म वातावरण एवं पौधा स्वास्थ्य के परिवर्तन पर महत्व देता है तथा इससे कृषि-रसायन इनपुट्स पर निर्भरता कम हो जाती है।
इन प्राकृतिक लाभों के अलावा, भारतीय कॉफ़ी उद्योग विशेषत: छोटे जोतों पर आधारित है। इन छोटे जोतों के अधिकांश भाग विशेषत: केरल के इडुक्की अंचल, तमिलनाडु के बोडिनायकन्नूर अंचल, आंध्र प्रदेश के सभी जनजातीय जोत तथा पूर्वोत्तर राज्यों में आते हैं जो स्वत: मूल जैव कृषि स्थल हैं। ये छोटे एवं जनजातीय उपजकर्ता अपने निम्न आर्थिक स्थिति एवं प्राकृतिक फ़ार्मिंग पर विश्वास के कारण रासायनिक खादों एवं पौधा संरक्षण रसायनिकों का उपयोग नहीं करते। यहाँ के फसल निरंतर कम है तथा निर्धारित स्तर तक ही प्राप्त होते हैं। अत: ये छोटे एवं जनजातीय जोतों को वर्तमान कृषि प्रथाओं को परवर्तित किए बिना प्रमाणित जैव कॉफ़ी उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है।
उत्तम संभावना के बावजूद, देश में 2007 में जैव कॉफ़ी केवल लगभग 2,600 हेक्टर्स में ही उपजाई गई है तथा अनुमानित उत्पाद लगभग 1700 मेट्रिक टन था। कर्नाटक के बाद तमिलनाडु एवं केरल इसके प्रमुख उपज क्षेत्र हैं। (जैव कॉफ़ी उत्पादक का डाटाबेस देखें भारत के प्रमाणित जैव कॉफ़ी जोत-2008)
भारत में जैव कॉफ़ी उत्पादन के लिए आदर्श व उपयुक्त परिस्थिति होने के बावजूद भी जैव कॉफ़ी क्षेत्र का विकास अति उत्साहवर्धक नहीं है। इस क्षेत्र की कुछ चिह्नित समस्याएँ निम्नलिखित है:
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1990 दशक के उत्तरार्द्ध में, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जैव कॉफ़ी ने उत्तम प्रीमियम प्राप्त किया था। परंतु विगत कुछ वर्षों से यह कम होते हुए लगभग 15% तक पहुँच गया है। भारतीय जैव कॉफ़ी की इस गिरावट का प्रमुख कारण यह है कि जैव कॉफ़ी के प्रमुख निर्यातक देश यानी अमेरिका में भारतीय जैव कॉफ़ी का प्रीमियम उतना आकर्षक नहीं है।
जैव कॉफ़ी के धीमे विकास के बावजूद भी, जैव कॉफ़ी के कुछ उत्पादकों ने विशेषतया माध्यम एवं उन्नत श्रेणी के उत्पादकों ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जैव कॉफ़ी के उच्च स्तरीय प्रीमियम को पहचान लिया है। यह उनके जैव कॉफ़ी की गुणता में सुधार के लिए किए गए निरंतर प्रयास एवं विपणन के कारण संभव हुआ है। लघु जोत समूहों को भी अपने जैव कॉफ़ी जोतों में उगाए जाने वाले काली मिर्च, वैनिला जैसे अंतरफसल के आकर्षक प्रीमियम के कारण जैव फ़ार्मिंग से अधिक लाभ प्राप्त हुआ है।
कॉफ़ी बोर्ड ने जैव कॉफ़ी उत्पादन के लिए क्षेत्र परीक्षण, सर्वेक्षण एवं अध्ययन पर आधारित प्रथाओं का पैकेज विकसित किया है। बोर्ड ने समय-समय पर जैव फ़ार्मिंग पर विभिन्न प्रकाशन भी प्रकाशित किए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख प्रकाशनों के नाम नीचे दिए गए हैं:
इनमें से कुछ प्रमुख प्रकाशनों के नाम नीचे दिए गए हैं:
2. जैव कॉफ़ी उत्पादन के लिए दिशा-निर्देश पर तकनीकी दस्तावेज़
पुस्तिकाएं
1. जैव कॉफ़ी एस्टेटों में कीटाणु एवं रोग नियंत्रण के लिए स्वीकृत इनपुट्स
2. जैव कॉफ़ी उत्पादन के लिए दिशा-निर्देश पर बुकलेट
विस्तारक फ़ोल्डर्स
1. जैव कॉफ़ी प्रमाणन के बारे में कैसे जानें ?
2. कॉफ़ी अवशेषों का कंपोस्टिंग
ये प्रकाशन सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष, केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान, कॉफ़ी अनुसंधान केंद्र पोस्ट, चिकमगलूर-577117, भारत से प्राप्त किए जा सकते हैं।
जैव कॉफ़ी उत्पादन पर राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीओपी)
1990 के दशक के दौरान भारत सरकार ने जैव कृषि पर राष्ट्रीय नीति बनाने की योजना का प्रारंभ किया तथा देश के जैव उत्पादन को प्रोत्साहित करने एवं जैव कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए उत्पाद मानक निर्धारित किया। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा इस पहल की अगुवाई की गई । मंत्रालय के अधीन कार्यरत वस्तुपूर्ति बोर्ड जैव कृषि पर राष्ट्रीय नीति तथा मानक निर्धारित करने में सक्रिय रूप से कार्यनिरत है। तदनुसार, वर्ष 2000 में औपचारिक रूप से जैव उत्पादन पर राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीओपी) प्रारंभ किया गया तथा 2001 में इसे एफ़टीडीआर अधिनियम के अधीन अधिसूचित किया गया। एनपीओपी को यूरोपियन संघ ने अपने जैव कृषि ईसी 2092/91 के नियमन के समरूपी मान्यता प्रदान की। इसका अर्थ यह है कि अलग ईयू प्रमाणन के बिना ही एनपीओपी के अधीन प्रमाणित किसी भी उत्पाद का अभिगम यूरोपियन बाज़ार में किया जा सकता है। यूएसडीए ने भारत द्वारा एनपीओपी के अधीन स्वीकृत स्तरीय प्रमाणन सिस्टम को भी मान्यता प्रदान की है, जिसका मतलब यह है कि यूएसडीए द्वारा अलग स्तरीय प्रमाणन चाहिए तो एनपीओपी के अधीन मान्यता प्राप्त सभी प्रमाणन एजेंसियाँ यूएसडीए राष्ट्रीय जैव कार्यक्रम के अनुसार निरीक्षण एवं प्रमाणन कर सकती हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 20 मान्यता प्राप्त प्रमाणन एजेंसियाँ हैं। एनपीओपी के संबंध में और अधिक जानकारी के लिए www.apeda.com पर लॉग ऑन करें।
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भारत में कॉफ़ी के फसल के पूर्वानुमान/प्राक्कलन की कार्यप्रणाली
• कॉफ़ी बाज़ार के उदारीकरण के पूर्व, एस्टोटों से अनिवार्य फसल विवरणियों तथा पूल एजेंट्स/ क्यूरिंग वर्क्स जैसे अन्य स्रोतों से प्राप्त सावधिक सूचनाओं के कारण फसल प्राक्कलन सचमुच वास्तविक थे।
• पूलिंग सिस्टम के निकालने के परिणामस्वरूप बोर्ड के पास विस्तारण नेटवर्क द्वारा प्राप्त फसल प्राक्कलन ही एकमात्र उपाय उपलब्ध था। फसल सीज़न 2000-01 तक विस्तारक अधिकारी अपने संबंधित अंचलों से संबद्ध सूचना के अनुसार पूर्वानुमान/प्राक्कलन तैयार करते थे जो अंचल/जिला/राज्य स्तर से प्राप्त फसल प्राक्कलन का औसत था। तब पूर्वानुमान अधिकतर वस्तुपरक रहता था।
• सीज़न 2000-01 से प्रतिमान पद्धति द्वारा फसल पूर्वानुमान और अधिक वैज्ञानिक बनाया गया। 2001-02 सीज़न के लिए फसल पूर्वानुमान, पारंपरिक कॉफ़ी उपजाने वाले क्षेत्रों के 43 कॉफ़ी अंचलों से जोतों के विभिन्न श्रेणी के सांयोगिक चयनित 889 एस्टेटों पर आधारित था। 2002-03 सीज़न के लिए अधिक यथार्थता प्राप्त करने के लिए पूर्व सीज़न के दुगुना यानी 1500 एस्टेटों से प्रतिमान प्राप्त किए गए तथा 2007-08 सीज़न से और बढ़कर प्रतिमान की मात्रा 2000 तक पहुँच गई।
• वर्तमान कार्यप्रणाली, प्रत्येक अंचल के एस्टेटों (जोतों के आधार पर) के आकार के अनुसार योजनाबद्ध बहू-स्तरीय सांयोगिक प्रतिमान तकनीक उपलब्ध कराती है। इस प्रतिमान संरचना में फसल की मात्रा का आधारिक स्तर कॉफ़ी की श्रेणी (अरेबिका या रोबस्टा) तथा जोतों के आकार (नौ श्रेणियाँ) पर आधारित है।
• कॉफ़ी की मात्रा का अनुपात बनाए रखने के लिए प्रत्येक स्तर का प्रतिमान मात्रा के अनुसार ही प्राप्त किया जाता है। आकार के अनुपात (पीपीएस) मानदंड, विभिन्न अंचलों के उपजाने वाले क्षेत्र का अनुपात तथा जोत के आकार की श्रेणी के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं।
• एस्टेटों से प्रत्येक अंचल एवं निर्धारित श्रेणी से आवश्यक प्रतिमान सांयोगिक रूप से प्राप्त किए जाते हैं। यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रत्येक अंचल के विभिन्न गाँवों में ये प्रतिमान समान रूप से वितरित किए जाते हैं।
• आजकल विस्तारण अधिकारी, विगत चार वर्षों से प्राप्त फसल, धारित पेड़ का विस्तार, महत्वपूर्ण अवधि (पुष्पण,बैकिंग व मानसून) के दौरान वर्षा, उपकर्ताओं की राय आदि पर समुचित विचार करने के बाद फसल के ‘ दृश्य पद्धति ’ निर्धारण अपनाते हैं।
• प्रत्येक चयनित एस्टेटों के पूर्वानुमान प्रत्येक सीज़न में तीन बार बनाया जाता है जो पुष्पणोत्तर (मई-जून), मानसूनोत्तर (अक्तूबर-नवंबर) तथा अंतिम सीज़न (मार्च-अप्रैल) का प्रतिनिधित्व करता है। वर्षापात, कीटाणु व रोग जैसे अन्य पैरामीटर्स के साथ फसल का क्षेत्र विवरण एवं अनुमानित उत्पादन का रेकॉर्ड किया जाता है। पूवानुमानों के बीच के उत्पादन के अंतर का कारण भी प्रस्तुत किया जाता है।
• प्रत्येक अंचल के धारित क्षेत्र के साथ उस अंचल के प्रतिमान एस्टेटों के संबंधित श्रेणी की औसत उत्पादकता को गुणित करते हुए अंचल के निर्धारित श्रेणी के उत्पादन का विवरण प्राप्त किया जाता है। अंचल के उत्पादन स्तर तक पहुँचने के लिए प्रत्येक श्रेणी के उत्पादन को जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया जिला एवं राज्य स्तर पर भी की जाती है।
• आंध्र प्रदेश, उड़ीशा एवं पूर्वोत्तर राज्यों के गैर-पारंपरिक क्षेत्रों से संबंधित अंचलों के लिए कार्यालयीन प्राक्कलन का उपयोग किया जाता है।
परंतु अब फसल प्राक्कलन के‘ दृश्य पद्धति ’ भी अपनाई जाती है।
फसल प्राक्कलन की यथार्थता, विभिन्न श्रेणियों एवं जोतों की श्रेणियों पर आधारित प्राक्कलन कार्यप्रणाली तथा विस्तारण डाटाबेस जैसे दो तत्वों पर आधारित है। फसल प्राक्कलन में त्रुटियाँ कम करने के लिए विस्तृत जनपरिचालन द्वारा कॉफ़ी क्षेत्र के डाटा के अद्यतनीकरण की आवश्यकता है।
इस संबंध में यदि कोई अभिमत व सुझाव हों तो पूर्वानुमान के साथ निम्न पते पर अग्रेषित करें:
उप निदेशक (बाज़ार अनुसंधान), कॉफ़ी बोर्ड, बेंगलूर
ई-मेल आईडी :
ageconomist[dot]cb[at]gmail[dot]com
राज्यों/कॉफ़ी क्षेत्रों/साइज़ श्रेणियों के प्रतिमानों का वितरण
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