भारतीय कॉफ़ी की गाथा सन 1600 ए.डी में पौराणिक धार्मिक संत बाबा बूदान द्वारा कर्नाटक के ‘बाबा बूदान गिरीज़’ के अपने आश्रम के आँगन
में ‘मोचा’ के ‘सात बीजों’ के रोपण से प्रारंभ हुई। ये पौधे काफी समय तक बागान कौतूहल के रुप में बने रहे और धीरे-धीरे आँगन में फैलने लगे।
18 वीं शताब्दी के दौरान कॉफ़ी की वाणिज्यक खेती प्रारंभ हुई तथा उन ब्रिटिश उद्यमियों की सफलता के लिए धन्यवाद दिया जाना है जिन्होंने
कॉफ़ी को दक्षिण भारत के इस प्रतिकूल वन भूभाग लाने का कार्य किया। उसके बाद से भारतीय कॉफ़ी उद्योग तेजी से आगे बढ़ा और विश्व के
कॉफ़ी मानचित्र में एक अनोखी पहचान बनाई है।
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इस बीच भारत में कॉफ़ी उद्योग के इतिहास में अनेक उतार-चढ़ाव देखे गए। प्रारंभ में 1860 के दशक तक वर्तमान कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडू के राज्यो के वनों में वाणिज्यक अरेबिका की खेती तेजी से बढ़ रही थी। उसके बाद अगले कुछ वर्षों के अंदर, सफेद तना छेदक (व्हाइट स्टेम बोरर), हरे बग एवं पत्ती किट्ट जैसी कीटाणुओं तथा रोगों के प्रबल विस्तृत प्रादुर्भाव से आगे बढ़ते हुए कॉफ़ी उद्योग पर अत्यधिक आशंका उत्पन्न की। सफेद तना छेदक और पत्ती किट्ट के निरंतर प्रकोप से अरेबिका खेती अत्यधिक प्रभावित हुई जिनके क्षेत्र अत्यधिक कम होने लगे। इससे 1900 के दशक में इंडो-चीनी क्षेत्र से पर्यावरण हितैषी रोबस्टा को भारत में लाने तथा निवारक उपायों की खोज के रूप में अनुसंधान प्रयास प्रारंभ करने की आवश्यकता पड़ी।
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1940 के दशक में दूसरे विश्व युद्ध के कारण बहुत कम मूल्य तथा कीटाणु एवं रोगों के प्रकोप के परिणामस्वरूप भारत में कॉफ़ी उद्योग अत्यंत निराशाजनक स्थिति में था। अब, भारत सरकार ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन सांविधिक अधिनियम ‘कॉफ़ी अधिनियम 1942 की धारा VII के द्वारा ‘कॉफ़ी बोर्ड’ का गठन किया। अध्यक्ष बोर्ड के मुख्य कार्यपालक हैं तथा इनकी नियुक्ति भारत सरकार द्वारा की जाती है जिन्हें सम्मिलित करने के बाद बोर्ड के 33 सदस्य हैं। शेष 32 सदस्या कॉफ़ी उपजाने वाले उद्योग, कॉफ़ी व्यापार हितैषी, क्यूरिंग स्थापनाओं, श्रम एवं उपभोक्ताओं के हितैषी, कॉफ़ी उपजाने वाले प्रमुख राज्यों के सरकार के प्रतिनिधि तथा सांसद जैसे विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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वर्ष 1996 में पूलिंग समाप्त हो जाने के बाद, कॉफ़ी बोर्ड संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को संभालते हुए कॉफ़ी क्षेत्र के लिए एक मित्र दार्शनिक एवं पथप्रदर्शक के रुप में काम कर रहा है। बोर्ड के आंतरिक क्रियाकलापों में अनुसंधान एवं विकास, प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण, गुणता सुधार, उपजाऊ क्षेत्र का विकास समर्थन, निर्यात एवं स्वदेशी बाजारों में कॉफ़ी का प्रचार-प्रसार को प्राथमिकता दी जाती है। (I) उत्पादन, उत्पादकता एवं गुणता का प्रोन्नयन;(II) भारतीय कॉफ़ी के लिए उच्च मूल्य लाभ प्राप्त करने हेतु निर्यात संवर्धन तथा (III) स्वदेशी बाजार के विकास का समर्थन आदि बोर्ड के क्रिया कलापों का लक्ष्य है।
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वर्ष 1925 के दौरान तत्कालीन मैसूर सरकार के द्वारा चिक्कमगलूरु जिला के बालेहोन्नूर के पास मैसूर कॉफ़ी परीक्षण केंद्र स्थापित करते हुए कॉफ़ी में संगठित अनुसंधान कार्य प्रारंभ किया गया। कॉफ़ी बोर्ड के गठन के बाद उसके प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन अनुसंधान केंद्र कार्य करने लगा। वर्तमान में बोर्ड के अनुसंधान विभाग के अधीन केन्द्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान के मुख्यालय एवं पाँच क्षेत्रीय स्टेशन हैं जहाँ 113 वैज्ञानिक कार्यरत हैं तथा यहाँ मुख्यतया कीटाणुओं व रोगों के प्रतिरोध के साथ कॉफ़ी के उत्तम प्रकार, उत्पादन , उत्पादकता, तथा गुणता के प्रोन्नयन हेतु प्रौद्योगिकी के मानकीकरण का कार्य किया जाता है।
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बोर्ड का विस्तारण स्कंध सभी प्रमुख कॉफ़ी उपजाने वाले क्षेत्रों में स्थित विस्तारण इकाइयों का विस्तृत नेटवर्क है जिसमें तकनीकी कार्मिकों की स्वीकृत संख्या 278 हैं। विस्तारण कार्मिक, उपजकर्ताओं को नवीनतम प्रौद्योगिकी के विकीर्णन, उपजकर्ताओं एवं फ़ार्म मज़दूरों के लिए क्षमता निर्धारण कार्यक्रमों का आयोजन, बोर्ड के विभिन्न विकास समर्थन, जोखिम बीमा तथा श्रम कल्याण योजनाओं का कार्यान्वयन और फसल प्राक्कलन, फसल हानि जैसे अन्य क्रियाकलाप आदि कार्यों में कार्यरत रहते हैं।
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बोर्ड के प्रधान कार्यालय, बेंगलूरु में बाज़ार आसूचना एकक कार्यरत है। इस एकक में बाज़ार सूचना एवं आसूचना, बाज़ार अनुसंधान अध्ययन , फसल पूर्वानुमान तथा कॉफ़ी अर्थशास्त्रीय पहलुओं से संबंधित विभिन्न क्रियाकलापों से संबंधित कार्य किया जाता है। इस एकक में डब्ल्यू टी ओ विषयों को सम्मिलित करते हुए कॉफ़ी व्यापार से संबंधित अनुसंधान पर भी अध्ययन किया जाता है। प्रसिद्ध प्रकाशनों में दैनिक बाज़ार असूचना रिपोर्ट तथा कॉफ़ी पर विस्तृत डेटाबेस (तिमाही) सम्मिलित है। भारत में कॉफ़ी उपभोग 2001, 2003, 2005, 2008, 2009 एवं कॉफ़ी सेवन की मनोवृत्ति 2007 सहित सावधिक रिपोर्टें पूरी की जा चुकी हैं । इस एकक ने (I) कॉफ़ी उत्पादक देशों (भारत, वियतनाम एवं ब्राज़ील) की तार्किकता तथा प्रतिस्पर्धात्मकता (II) रुस और सी आई एस देशों में भारतीय कॉफ़ी निर्यात की प्रोन्नयन पर एम ए ई योजना (III) भारतीय कॉफ़ी निर्यात के पारगमन मूल्य एवं कॉफ़ी फुटकर बिक्री पर मैनुअल पर अध्ययन का समन्वय किया। यह एकक कॉफ़ी उपजकर्ताओं के लिए भारत सरकार के मूल्य व स्थिरीकरण निधि योजना तथा वर्षापात बीमा योजना के कार्यान्वयन का भी समन्वय करता है। इस एकक द्वारा बोर्ड की कार्यालयीन वेबसाइट का अनुरक्षण भी किया जाता है।
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प्रोन्नयन विभाग निर्यात बाज़ार में भारतीय कॉफ़ी के प्रोन्नयन एवं स्वदेशी बाज़ार में कॉफ़ी उपभोग के संवर्धन के प्रोन्नयन का कार्य करता है।
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वर्ष 1996 में उदारीकरण के पश्चात विपणन गतिविधियाँ अनियमित हो गई है। निर्यात का कार्य निर्यातकों के द्वारा किया जाता है। अत: भारतीय कॉफ़ी निर्यात के सरलीकरण एवं प्रोन्नयन में कॉफ़ी बोर्ड अपनी भूमिका निभाता है। तथापि, निर्यातकों के पंजीकरण का दायित्व कॉफ़ी बोर्ड पर है। पंजीकृत कॉफ़ी निर्यातकों की कुल संख्या लगभग 395 है। इसके अनुक्रम में, बोर्ड कॉफ़ी अधिनियम की धारा 20 के अधीन भारतीय कॉफ़ी निर्यात के लिए परमिट भी जारी करता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय कॉफ़ी अनुबंध के प्रावधानों के अनुसार मूल प्रमाणपत्र भी जारी करता है।
निर्यात संवर्धन के अंतर्गत फुटकर पैकों में मूल्य संवर्धित की कॉफ़ी का निर्यात और दूरस्थ स्थानों को उत्तम मूल्य कॉफ़ी निर्यात कुछ हद तक पारगमन मूल्य प्रारंभ करने तथा निर्यात बाज़ार में भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धात्मक बनने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जाता है। ये प्रोत्साहन एक ओर सं.रा.अ, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड आदि जैसे उन्नत मूल्य स्थानों में भारतीय कॉफ़ी के पदचिह्न का प्रचार-प्रसार एवं यूरोपियन संघ/रुस एवं सी आई एस जैसे हमारे पारंपरिक बाज़ारों में भारतीय कॉफ़ी का प्रवेश बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।
इसके अलावा बोर्ड समुद्रपारीय रोस्टर्स, व्यापारियों तथा उपभोक्ताओं को भारतीय कॉफ़ी की गुणता के बारे में जागरुकता विकसित करने के लिए प्रमुख उपभोक्ता देशों में आयोजित प्रमुख कॉफ़ी व्यापार शो/प्रदर्शनियों में नियमित रुप से भाग लेता है। बोर्ड फ़ाइन कॉफ़ी के चयन तथा उन्हें निर्यात बाज़ार में लाने के लिए फ़्लैवर ऑफ इंडिया – द फ़ाइन कप प्रतियोगिताओं का भी आयोजन करता है।
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यह विभाग संपूर्ण देश के प्रमुख शहरों में स्थित 12 इंडिया कॉफ़ी हाउस के द्वारा देश में कॉफ़ी उपभोग का संवर्धन करता है। इसके अलावा यह विभाग उपभोक्ताओं में भारतीय कॉफ़ी के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर के प्रदर्शनियों व मेलाओं में भाग लेता है और मानव स्वास्थ्य पर कॉफ़ी उपभोग के सकारात्मक प्रभावों के बारे में उपभोक्ताओं को प्रशिक्षण देता है।
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भारत में कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडू जैसे कॉफ़ी के परंपरागत रुप से फैले पश्चिमी घाटों में उपजाई जाती है। कॉफ़ी की खेती आंध्र प्रदेश और उडिशा के गैर- परंपरागत क्षेत्रों के साथ-साथ पूर्वोत्तर राज्यों में भी तेजी से बढ़ रही है। वस्तुत: कॉफ़ी निर्यातोन्मुख पदार्थ है तथा देश में उत्पाादित कॉफ़ी के 65% से 70% तक का निर्यात किया जाता है जबकि शेष कॉफ़ी का उपभोग देश में ही किया जाता है।
भारतीय कॉफ़ी उद्योग लगभग रु.4000 करोड़ तक का विदेशी विनिमय उपलब्ध कराता है। भारतीय कॉफ़ी ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है तथा भारतीय कॉफ़ी उच्च प्रीमियम कमा रही है, विशेषकर भारतीय रोबस्टा जिसे अपनी अच्छी ब्लेंडिंग गुणता के लिए उच्च प्राथमिकता दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत से अरेबिका कॉफ़ी की भी अच्छी माँग है। निम्न आयात सघनता एवं उच्च स्तरीय रोज़गार घटक के साथ कॉफ़ी एक निर्यातोन्मुख उत्पाद है। इस तथ्य से यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में छह लाख से भी अधिक लोग प्रत्यक्ष रुप से कॉफ़ी की नौकरी में कार्यरत हैं तथा समरूपी संख्यां में लोगों को अप्रत्यक्ष रुप से रोजगार भी मिलता है।
कॉफ़ी के दो मुख्य प्रकार हैं अर्थात अरेबिका एवं रोबस्टा भारत में उपजाई जाती हैं। अरेबिका मृदु कॉफ़ी है, पर इसकी फलियाँ अधिक खुशबूदार होने के कारण रोबस्टा फलियों की तुलना में इसका बाजार मूल्य अधिक है। दूसरी ओर रोबस्टा में अत्यधिक प्रतिरोध शक्ति है, अत: विभिन्न ब्लेंड बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है। रोबस्टा की तुलना में अरेबिका उच्च उन्नतांशों में उगाए जाते हैं। 15 डिग्री सेल्सियस से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच का ठण्डा और सम तापमान अरेबिका के लिए उपयुक्त है जबकि रोबस्टा के लिए 20 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान के साथ गर्म और उन्नत तापमान उपयुक्त है। अरेबिका को अधिक देख-भाल और पोषण देने की आवश्यकता है तथा यह बड़े जोतों के लिए उपयुक्त है जबकि रोबस्टा सभी प्रकार के खेतों के लिए उपयुक्त है। नवंबर से जनवरी के बीच अरेबिका का संग्रहण होता है जबकि रोबस्टा के लिए यह दिसंबर से फरवरी तक होता है। अरेबिका सफेद तना छेदक, पत्ती किट्ट आदि जैसे कीटाणुओं एवं रोगों के संवेदी है और इसे रोबस्टा से अधिक छाया की आवश्यकता है।
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