अनुसंधान
भारत में कॉफ़ी अनुसंधान
भारत, संसार के ऐसे कुछ देशों में से एक है जहाँ बागान समुदाय को तकनीकी दिशा-निर्देश देने के उद्देश्य से कॉफ़ी अनुसंधान की शुरुआत हुई है। कॉफ़ी बागानों में विभिन्न कीटाणुओं एवं रोगों से मुक्ति पाने के लिए अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम के रूप में 1892 में दक्षिण भारतीय संयुक्त प्लांटर्स संगठन की स्थापना की गई थी। बाद में 1925 में तत्कालीन मैसूर सरकार के कृषि निदेशक डॉ.सी.एल. कोलमैन ने महत्वपूर्ण दूरदर्शी प्रयास के रूप में कर्नाटक के चिक्कमगलूरु जिले के बालेहोन्नूर के पास मैसूर कॉफ़ी परीक्षण संस्थान के नाम पर अनन्य कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान की स्थापना की जिसका प्राथमिक उद्देश्य विभिन्न कॉफ़ी प्रकारों के संवर्धन तथा कीटाणुओं तथा रोगों के नियंत्रण उपायों का विकास था । इस परीक्षण केंद्र के प्रथम प्रभारी अनुसंधान अधिकारी डॉ.एम.के.वेंकट राव, माइकोलजिस्ट थे तथा 1925-31 के दौरान विभिन्न क्षेत्रों से पत्ता रोग प्रतिरोधी अरेबिका सामग्रियों के संग्रहण का दायित्व उन्हें सौंपा गया था।कॉफ़ी पत्ता किट्ट फंगस के शारीरिक अस्थित्व तथा विस्तारक मान में पत्ता किट्ट फंगस पर बोरडक्स मिश्रण के सुव्यवस्थित फुहार के अध्ययन के नेतृत्व के लिए यूपीएएसआई से श्री.एम.डब्ल्यू . माइने, कॉफ़ी वैज्ञानिक अधिकारी को प्रतिनियुक्त किया गया था। श्री.के.एच.श्रीनिवासन, कृषि सहायक निदेशक तथा श्री.आर.एल.नरसिंह स्वामी, प्लांट ब्रीडिंग निरीक्षक के सहयोग के साथ श्री.एम.डबल्यू. माइने के सफल प्रयास से 1940 में प्रथम संशोधित अरेबिका चयनित एस.288 व एस.333 जारी किए गए।
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1940 के दशक के दौरान द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप निम्नतम मूल्य तथा कीटाणुओं एवं रोगों के आक्रमण के कारण भारतीय कॉफ़ी उद्योग अत्यंत निराशाजनक स्थिति में था। इसी समय भारत सरकार ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन संवैधानिक अधिनियम “कॉफ़ी अधिनियम VII-1942” के द्वारा कॉफ़ी बोर्ड की स्थापना की। बोर्ड को कॉफ़ी क्षेत्र के विपणन, वित्त, अनुसंधान एवं विकास आदि क्षेत्र के विस्तार के समर्थन का दायित्व सौंपा गया। तदनुसार, बोर्ड ने 1946 में ‘ मैसूर कॉफ़ी परीक्षण केंद्र ’ का बागडोर सँभाला तथा उसका “ केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान ” के रूप में पुन:नामकरण किया। कॉफ़ी के विभिन्न क्षेत्रों के सविस्तार अनुसंधान एवं उपजकर्ताओं की सहायता के लिए समय-समय पर आधुनिक प्रौद्योगिकी के कार्यान्वयन के विस्तृत अधिदेश के साथ कॉफ़ी बोर्ड ने इस संस्थान को अपने अनुसंधान विभाग का मुख्यालय बना दिया।
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केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान (सीसीआरआर्ई), आधुनिक कॉफ़ी अनुसंधान की मुख्य धारा के क्षेत्रों की अग्रणी संस्था है जिसने सन 2000 में अपनी प्लेटिनम जयंती मनाई थी। सीसीआरआर्ई ने भारत सरकार के विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वैज्ञानिक अनुसंधान में कार्यरत संस्था के रूप में मान्यता प्राप्त की है। केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान, पौधा संवर्धन व आनुवंशिकी, कॉफ़ी सस्य-विज्ञान, मृदा विज्ञान व कृषि रसायन-विज्ञान, पौधा कायिकी, रोग विज्ञान, कीट विज्ञान, फसलोत्तर प्रौद्योगिकी, कॉफ़ी जैव-प्रौद्योगिकी तथा कॉफ़ी गुणता जैसे विभिन्न विषयों के गहन एवं प्रगत अनुसंधान में कार्यरत है।
प्रधान कैंपस में स्थित अनुसंधान प्रभागों के आलावा, मैसूर में अनन्य ऊतक संस्कार व जैव प्रौद्योगिकी प्रभाग की स्थापना की गई है जहाँ उच्च स्तरीय फसल एवं कीटाणु व रोग-प्रतिरोधी प्रभेदों के विकास के लिए परंपरागत संवर्धन कार्यक्रमों के समर्थन/प्रोत्साहन के लिए जैव-प्रद्योगिकी एवं आणविक जैविकी का अध्ययन आयोजित किया जाता है। कॉफ़ी बोर्ड के मुख्य कार्यालय में स्थित गुणता नियंत्रण प्रभाग द्वारा कॉफ़ी की गुणता के प्रोन्नयन के लिए विभिन्न अनुसंधान विभागों को सक्रिय सहयोग प्रदान किया जाता है।
केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान में अनुसंधान कार्य संपन्न करने के लिए तकनीकी स्टाफ़ के समर्थन के साथ लगभग 130 वैज्ञानिक कार्यरत हैं। यह केंद्र पौधा संवर्धन , आणविक जैविकी, मृदा विज्ञान, पौधा जैवरसायन विज्ञान, कीटाणु व रोग संबंधी अनुसंधान, फसलोत्तर प्रौद्योगिकी, जल प्रदूषण एवं क्षेत्र अनुप्रयोग से संबंधित अन्य कार्य आदि चयनित क्षेत्रों के उच्च स्तरीय मूलभूत तथा अनुप्रयुक्त अनुसंधान के क्रियान्वयन के ध्येय को आगे बढ़ा रहा है। सीसीआरआई में अन्य बागान एवं कृषीय उपजों से संबंधित पत्रिकाओं के अलावा सुसज्जित आधुनिक प्रयोगशाला सुविधाएँ तथा विभिन्न विषयों से संबंधित अनेक पुस्तकों से संग्रहीत केंद्रीकृत पुस्तकालय है।
इसके अतिरिक्त यहाँ कॉफ़ी बोर्ड के कॉफ़ी उपजकर्ता, महाजन, उद्यान-कृषक, संपदा प्रबंधक, पर्यवेक्षकीय कार्मिक, विस्तारण अधिकारी आदि को प्रशिक्षण देने के लिए सुस्थापित प्रशिक्षण अनुभाग है। प्रशिक्षण अनुभाग यूएनडीपी एवं एफ़एओ के नाम से जाना जाता है जहाँ विदेशी नागरिकों को भी कॉफ़ी संवर्धन के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाता है। अब तक यहाँ से भारतीय कॉफ़ी उपजकर्ता एवं कॉफ़ी श्रेणी के अन्य व्यक्तियों के अलावा ईथियोपिया, केनिया, वियतनाम एवं मेसर्स नेस्ले इंटरनेशनल के कार्मिकों को प्रशिक्षण दिया गया है।
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प्रधान संस्थान के विभिन्न कृषीय-वातावरणिक क्षेत्रों के अनुसंधान परिणामों के परीक्षण तथा विशेष स्थानीय प्रौद्योगिकी के क्रियान्वयन के लिए चरणबद्ध रूप से महत्वपूर्ण कॉफ़ी उपजीय क्षेत्रों में क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही भारत के कॉफ़ी अनुसंधान नेटवर्क, महत्वपूर्ण कॉफ़ी उपजीय क्षेत्र एवं उनके कृषीय-वातावरणिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। निम्न स्थानों पर क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र कार्यरत हैं :
(1) चेट्टल्लि, कोड़गु जिला, कर्नाटक
(2) चुंडेल, वयनाड़ जिला, केरल
(3) थांडीगुड़ी, डिंडिगल जिला, तमिलनाडु
(4) राघवेंद्र नगर, विशाग जिला, आंध्रप्रदेश तथा
(5) दिफू, कर्बी अंगलांग जिला, असम
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यह केंद्र 1964 में कर्नाटक के कोडगु जिला के चेट्टल्लि गाँव में संस्थापित हुआ जो देश के महत्वपूर्ण कॉफ़ी क्षेत्र में स्थित है। इस केंद्र के अधीन कुल 131 हेक्टर्स का क्षेत्र है जिसमें से 80 हेक्टर्स में अनुसंधान परीक्षणों के लिए कॉफ़ी उपजी हुई है। इस केंद्र के वैज्ञानिक एवं तकनीकी स्टाफ़ की कुल संख्या 20 है तथा सभी मुख्य विषयों के अनुसंधान के लिए सुव्यवस्थित प्रयोगशाला की सुविधा उपलब्ध है।
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देश के अधिकतम कॉफ़ी उत्पादन करने वाले राज्यों में केरल दूसरे स्थान पर है जहाँ छोटे-छोटे जोतों में रोबस्टा का उत्पादन किया जाता है। इस क्षेत्र में रोबस्टा के लिए अनुयोज्य समुचित प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए वर्ष 1977-78 के दौरान केरल के वयनाड़ जिले के चुंडेल गाँव के पास 166 हेक्टर्स के क्षेत्र में क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान स्थापित किया गया। इस केंद्र के अधीन 30 हेक्टर्स के कॉफ़ी अनुसंधान फ़ार्म है, 15 वैज्ञानिक एवं तकनीकी स्टाफ हैं तथा विभिन्न विषयों पर अनुसंधान कार्य करने के लिए पर्याप्त प्रयोगशाला सुविधा उपलब्ध है।
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तमिलनाडु राज्य के कॉफ़ी क्षेत्र, निम्न वर्षपात के साथ होने वाली पूर्वोत्तर वर्षा के अधीन आते हैं तथा इसलिए कॉफ़ी कृषि के लिए अलग प्रकार के पैकेज की आवश्यकता है। अरेबिका कॉफ़ी के महत्वपूर्ण योगदान के क्षेत्र होने के कारण तमिलनाडु के पलनी पहाड़ी में थांडीगुडी गाँव के समीप 12.5 हेक्टर्स के क्षेत्र में क्षेत्रीय केंद्र की स्थापना की गई है। इस केंद्र के अधीन 6.5 हेक्टर्स के कॉफ़ी अनुसंधान फ़ार्म है,10 वैज्ञानिक एवं तकनीकी स्टाफ कार्यरत हैं तथा अनुसंधान कार्य संपन्न करने के लिए उत्तम प्रयोगशाला सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
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अंध्रप्रदेश के पूर्वी घाट के जनजातीय क्षेत्र तथा उडिशा कॉफ़ी कृषि के मुख्य गैर-परंपराग्त क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। आंध्रप्रदेश के प्रांतीय जनजाती के हानिकारक ‘पोडु’ खेती से प्रभावित बंजर पहाड़ी क्षेत्र पर हरित वनावरण द्वारा जनजाती के सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए मुख्यतया यहाँ कॉफ़ी खेती का प्रारंभ किया गया था। इन क्षेत्रों में कॉफ़ी के लिए समुचित उत्पाद प्रौद्योगिकी विकसित करने के मुख्य उद्देश्य से अंध्रप्रदेश के विशाखपट्टणम जिले के चिंतपल्लि गाँव में 1976 के दौरान एक क्षेत्रीय कॉफ़ी केंद्र की स्थापना की गई। इस केंद्र के अधीन कॉफ़ी अनुसंधान के लिए 60 हेक्टर्स के फ़ार्म के साथ पर्याप्त प्रयोगशाला अंतरसंरचना है तथा 10 वैज्ञानिक एवं तकनीकी स्टाफ कार्यरत हैं।
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वर्ष 1950 के दौरान पूर्वोत्तर क्षेत्र के पहाडी वन क्षेत्र में, मुख्यतया देशी जनजातीय समुदाय के परिवर्ती (झुम) खेती के पुरानी आदत से दूर ले जाकर उस क्षेत्र के परिवर्ती परिस्थिति के संरक्षण द्वारा लाभकारी रोज़गार प्रदान करने के लिए कॉफ़ी उत्पादन प्रारंभ किया गया। वर्ष 1985 के दौरान इस क्षेत्र में कॉफ़ी के उत्पादन के लिए अनुयोज्य उत्पादन प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए असम राज्य के दिफू के पास 25 हेक्टर्स में क्षेत्रीय केंद्र की स्थापना की गई।
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• कॉफ़ी गुणता के सुधार के लिए कप गुणता मूल्यांकन तथा उससे संबंधित अनुसंधान
• कॉफ़ी के अवशेष के अनुमान तथा अन्य संदूषकों के लिए विश्लेषण पद्धतियों का मानकीकरण
• कॉफ़ी गुणता के पैरामीटर्स के मानकीकरण का संशोधन/संस्थापन
• कॉफ़ी की रोस्टिंग, विकास, पैकेजिंग, फुटकर बिक्री तथा कॉफ़ी गुणता मूल्यांकन पर कॉफ़ी शास्त्र प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन
• कॉफ़ी गुणता प्रबंधन में एक वर्षीय स्नातकोत्तर डिप्लोमा का आयोजन
• उत्तम गुणता की कॉफ़ी के चयन के लिए “फ़्लैवर ऑफ़ इंडिया-फ़ाइन कप पुरस्कार” प्रतियोगिता का आयोजन
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विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) के शासन के अधीन उदारीकृत व्यापार वातावरण में खाद्य उत्पादों की गुणता के लिए महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस युग में गुणता के दो विभिन्न अर्थ है एक खाद्य के मूल्य व स्वाद की गुणता तथा दूसरा मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा की गुणता है। डबल्यूटीओ के अधीन स्वास्थ्यपरक व फाइटो स्वास्थ्यपरक (एसपीएस) करार के अनुसार सूक्ष्म स्वच्छता, माइकोटोक्सिन्स, कीटाणुनाशक अवशेष, भारी धातु संदूषण जैसे स्वास्थ्य संबंधी गुणता समस्याओं के लिए प्राथमिकता दी गई है। आगामी वर्षों में कॉफ़ी जैसे निर्यात आधारित वस्तुओं के व्यापार के लिए यह प्रावधान लागू होगा। कॉफ़ी व्यापार में एसपीएस मानकों का महत्व जानते हुए कॉफ़ी बोर्ड ने वर्ष 2001 में अंतरराष्ट्रीय परियोजना के अधीन विश्लेषिक प्रयोगशाला की स्थापना की है।
विश्लेषिक प्रयोगशाला में उपलब्ध सुविधाएँ
विश्लेषिक प्रयोगशाला एचपीएलसी (ओक्रोटोक्सिन-ए व कफ़ीन तत्व के अनुमान के लिए शिमाड्जू व जल निर्मित), कीटाणुनाशक अवशिष्ट विश्लेषण के लिए गैस क्रोमाटोग्राफी (एजिलिययंट टेकनोलजीस), मिल्लीपोर जल शोधन एकक, आयातित स्पेक्ट्रोमीटर, आयातित ओवन्स, आयातित सेनाई मशीन, आयातित रोटरी वाष्पीकारक, आयातित प्रतिमान मिल्स, आयातित डी-फ्रीज़र, आयातित प्रतिमान ब्लेंडर, आयातित सेंट्रीफ्यूज, आयातित शैकर्स, आयातित नमीमापक मीटर (सिनार टेकनॉलजी,इंग्लैंड) तथा ऑटोक्लेव, पीएच मीटर व सोनिकैटर जैसे विभिन्न उपकरणों से सुसज्जित है।
कॉफ़ी उद्योग के लिए प्रदत्त विश्लेषिक सेवाएँ
विश्लेषिक प्रयोगशाला द्वारा प्लांटेर्स, निर्यातक, व्यापारी एवं अनुसंधान संस्थानों के लिए प्रभार व्यवस्था के आधार पर निम्नलिखित विश्लेषिक सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। “कॉफ़ी बोर्ड सामान्य फंड खाता सं. 54044620308 पर रेखित डिमांड ड्राफ़्ट/स्थानीय चैक द्वारा भुगतान किया जा सकता है तथा वही निम्न पते पर भेजा जा सकता है:
अध्यक्ष, गुणता नियंत्रण प्रभाग,
विश्लेषिक प्रयोगशाला, कॉफ़ी बोर्ड,
नं.1, अंबेडकर वीथी, बेंगलूर-560001.
दूरभाष सं.080-222 666 88 फ़ैक्स नं. +91-80-222 555 57
ई मेल : analabshancb [at] gmail [dot]com OR hdqccoffeeboard [at] gmail [dot]com
गुणता प्रयोगशाला
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क्रमांक
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सेवा
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विश्लेषण प्रभार (रू.)
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1.
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नमी तत्व का विश्लेषण
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50/-
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2.
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भौतिक विश्लेषण
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150/-
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3.
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कप टैस्टिंग
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150/-
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4.
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कप टैस्टिंग व भौतिक विश्लेषण
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300/-
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5.
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आर&जी कॉफ़ी ब्लेंड्स
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500/-
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6.
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एसप्रेस्सो ब्लेंड्स विश्लेषण
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500/-
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7.
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इंस्टेंट कॉफ़ी विश्लेषण
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300/-
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विश्लेषिक प्रयोगशाला
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क्रमांक
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सेवा
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विश्लेषण प्रभार (रू.)
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1.
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नमी तत्व का विश्लेषण
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300/-
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2.
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कुल एश
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400/-
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3.
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अम्ल अघुलनीय एश
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375/-
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4.
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कफ़ीन
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1000/-
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5.
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जल घुलनीय एश
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400/-
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6.
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उबले जल में घुलनीयता
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150/-
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7.
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शीतल जल में घुलनीयता
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150/-
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8.
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ओक्रोटोक्सिन
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3500/-
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9.
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कीटाणुनाशक अवशिष्ट प्रति मिश्रण
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1000/-
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10.
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पीएच
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150/-
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11.
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घुलनीय एश की क्षारीयता
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300/-
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12.
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जल घुलनीय तत्व
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300/-
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13.
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नमी मीटर का व्यास-नापन
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1500/-
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प्राकृतिक जीव-जंतुओं को संरक्षित करते हुए छायादार पेड़ों के बीच में कॉफ़ी उगाने वाले कुछ देशों के बीच में भारत का भी महत्वपूर्ण स्थान है। भारत के कॉफ़ी बागानों में लगभग 250 विभिन्न श्रेणियों के फलीदार तथा अन्य हरित श्रेणी के पेड़ पाए जाते हैं। इसके अलावा कॉफ़ी बागानों में सामान्यतया अंतरफसल के रूप में काली मिर्च, संतरा तथा सुपारी, इलायची, वैनिला जैसे सहवर्ती फसल उगाए जाते हैं। इन विपरीत परिस्थितियों में क्षेत्र चयन के समय पर वैज्ञानिकों को अलग प्रकार की चुनौती का सामना करना पड़ता है।
• वाणिज्यक कृषि के लिए 16 (13 अरेबिका एवं 3 रोबस्टा) प्रकार की उन्नत उपजीय, रोग-प्रतिरोधी, सर्व स्वीकार्य श्रेणियाँ जारी की गई हैं।
• वर्ष 2007 के दौरान जारी की गई चंद्रगिरी अरेबिका ने पत्ता किट्ट रोग से प्रतिरोध करने की शक्ति प्रदर्शित करने के साथ ही उच्च स्तरीय उपज तथा अधिक प्रतिशत (80%) ए श्रेणी फलियों की क्षमता प्राप्त की है।
• कॉफ़ी के लिए सूक्ष्म प्रचार-प्रसार प्रौद्योगिकी का मानकीकरण किया गया।
• उच्च स्तरीय उत्पादन प्राप्त करने के लिए नर्सरी प्रबंधन के लिए कृषीय तकनीक, मृदा व जल संरक्षण, पौधा प्रशिक्षण व छंटाई, सिंचाई प्रबंधन (स्प्रिंगलर व ड्रिप), निराई प्रबंधन आदि का मानकीकरण किया गया।
• जैव कॉफ़ी के उत्पादन के लिए अभ्यास पैकेज
• धारणीय कॉफ़ी उत्पादन सिस्टम के प्रोन्नयन के लिए कॉफ़ी आधारित फसल सिस्टम की संस्तुति
• उर्वरक अनुप्रयोग के लिए समेकित विकसित पोषक प्रबंधन पैकेज तथा मृदा व पत्ता विश्लेषण पर आधारित सलहकारी सेवा
• अनावृष्टि प्रभाव कम करने के लिए अनावृष्टि प्रभाव सूचकांक एवं योजनाओं का विकास
• कॉफ़ी के मुख्य रोग तथा कीटाणुओं के प्रतिरोध प्रबंधन के लिए समेकित कीटाणु एवं रोग प्रबंधन (आईपीडीएम) पैकेजों का विकास
• प्राकृतिक प्रतिरोधक/फेरोमोन्स/काइरोमोन्स के प्रयोग द्वारा पर्यावरण-हितैषी कीटाणु प्रबंधन पैकेज का प्रचार-प्रसार
• गतिशील कॉफ़ी संसाधन के पर्यावरण-हितैषी प्रबंधन के साथ एस्टेट स्तर पर कॉफ़ी संसाधन की आर्द्र एवं निर्जल पद्धति का मानकीकरण
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सर्वोत्तम प्रौद्योगिकी के विकास के लिए अनुसंधान संस्थानों/संगठनों के बीच बहु-आयामी एवं अंतर-संस्थागत सहयोग की आवश्यकता है। केंद्रीय कॉफ़ी अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तर पर विभिन्न संस्थानों के साथ सक्रिय सहयोग प्रदान कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर
• प्राकृतिक संसाधन संस्थान, ग्रीनविच विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम
• सीआईआरएडी, मोंटपेल्लियर, फ्रांस
• आईआरडी, मोंटपेल्लियर, फ्रांस
• सीएबीआई, जैवविज्ञान, यू.के
• ट्रियस्टा विश्वविद्यालय, इटली
• सीआईएफ़सी, पुर्तुगल
• कॉफ़ी अनुसंधान प्रतिष्ठान, केन्या
• खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ़एओ), रॉम
• अंतरराष्ट्रीय कॉफ़ी संगठन (आईसीओ) एवं सामान्य वस्तु निधि (सीएफ़सी)
• अंतरराष्ट्रीय कॉफ़ी जेनोम नेटवर्क, फ्रांस
राष्ट्रीय स्तर पर
• जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), नई दिल्ली
• केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिक अनुसंधान संस्थान (सीएफ़टीआरआई), मैसूर
• कोशिकीय एवं आणविक जैविकी केंद्र सीसीएमबी), हैदराबाद
• आईसीएआर संस्थान एवं कृषि विश्वविद्यालय
• काष्ठ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान,बेंगलूर
• भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलूर
• मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, मदुरै
निम्नलिखित विश्वविद्यालयों के द्वारा सीसीआरआई को प्रगत अनुसंधान कार्य तथा शोध कार्य की उपाधि प्राप्त करने के लिए केंद्र के रूप में मान्यता प्रदान की है:
• कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, जीकेवीके, बेंगलूर
• कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़
• मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर
• कुवेंपु विश्वविद्यालय, शंकरगट्टा, शिमोगा
• मंगलूर विश्वविद्यालय, मंगलूर
• कालिकट विश्वविद्यालय, कालिकट
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1. “ रोग विज्ञान एवं प्रमुख रोगों से प्रतिरोध से कॉफ़ी के विकास ” विषय (1990-1994) पर सहयोगी अनुसंधान कार्यक्रम जिसमें सीआईएफ़सी, पुर्तुगल; सीसीआरआई, भारत; कॉफ़ी अनुसंधान केंद्र, मालावी तथा जैव विज्ञान स्कूल, नोरविच, यूनाइटेड किंगडम सम्मिलित हैं।
2. “ कॉफ़ी व्हाइट स्टेर्म बोरर के नियंत्रण के लिए लिंग फेरोमोन सिस्टम का विकास ” विषय (1996-1998) पर अनुसंधान जो प्राकृतिक संसाधन संस्थान, ग्रीनविच विश्वविद्यालय, यू. के एवं सीसीआरआई, भारत द्वारा कार्यान्वित है।
3. कॉफ़ी के बीटी जीन्स के विकास के लिए इंडो-फ़्रेंच सहयोगी परियोजना – 1995-1998
4. “ कॉफ़ी बेरी बोरर के निवारण के लिए समेकित प्रबंधन ” विषय पर बहु-देशीय आईसीओ-सीएफसी परियोजना
5. यह परियोजना 1998-2001 के दौरान सीएबीए-जैव विज्ञान, लंदन द्वारा भारत, कोलंबिया, मेक्सिको, इक्वडोर, ग्वाटीमाला, होंडुरास व जमैका जैसे सात कॉफ़ी उत्पादक देशों में कार्यान्वित किया गया है।
6. “ फफूँदी सृजन निवारण द्वारा कॉफ़ी गुणता प्रवर्धन -2000-2005 ” विषय पर आईसीओ/ सीएफसी/एफ़एओ बहु-देशीय वैश्विक परियोजना, जो एफ़एओ, रोम द्वारा भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, कोलंबिया, आइवरी कोस्ट, उगांडा जैसे छह कॉफ़ी उत्पादक देशों में कार्यान्वित किया गया है।
7. “ कॉफ़ी उत्पादक देशों में विविधता -2006-07 ” विषय पर आईसीओ- सीएफसी परियोजना, जो प्राकृतिक संसाधन संस्थान, ग्रीनविच विश्वविद्यालय, यू.के द्वारा भारत, केन्या, ज़िम्बाब्वे, उगांडा, कोस्टारिका, ब्राज़ील, ग्वाटीमाला जैसे सात कॉफ़ी उत्पादक देशों में कार्यान्वित किया गया है।
8. “ भारत, मालावी एवं ज़िम्बाब्वे के लघु-जोत कॉफ़ी फ़ार्म्स में समेकित स्टेर्म बोरर प्रबंधन -2002-2007 ” विषय पर बहु-देशीय आईसीओ-सीएफसी परियोजना जो सीएबीआई - जैव विज्ञान, लंदन द्वारा कार्यान्वित है।
9. “ केंद्रीय अमेरिका, पूर्वी आफ़्रिका एवं भारत के कॉफ़ी कृषि वानिकी के पर्यावरणिक तथा बाज़ार मूल्यों के संयोजन, प्रवर्धन व धारणीयता के लिए कॉफ़ी कृषि वानिकी नेटवर्क (काफ़नेट) – 2004-2007 ” जो सीआईआरएडी द्वारा कार्यान्वित है तथा यूरोपियन संघ द्वारा निधिक है।
10. “ कॉफ़ी पत्ताकीट पर बहु-देशीय सहयोगी आईसीओ-सीएफसी परियोजना – 2008-12 ” जो भारत, केन्या, ज़िम्बाब्वे एवं मालावी जैसे चार देशों में सीअबीआई द्वारा कार्यान्वित है।
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1. “ कॉफ़ी के विकास के लिए जैव प्रौद्योगिकी दृष्टिकोण ” 1999 - 2004 विषय पर बहु-संस्थागत नेटवर्क कार्यक्रम जो डीबीटी, नई दिल्ली; सीसीआरआई; सीसीएमबी, हैदराबाद; सीएफ़टीआरआई, मैसूर; एमकेयू, मदुरै; यूएएस, बेंगलूर एवं आईआईएससी, बेंगलूर द्वारा प्रायोजित है।
2. “ भारतीय कॉफ़ी जेनोम अनुसंधान कर्यक्रम ” 2007- 2010 विषय पर बहु-संस्थागत नेटवर्क कार्यक्रम जो डीबीटी, नई दिल्ली; सीसीआरआई; सीसीएमबी, हैदराबाद; सीएफ़टीआरआई, मैसूर; एमकेयू, मदुरै एवं यूएएस, बेंगलूर द्वारा प्रायोजित है।
3. “ रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर पर्यावरण हितैषी व जैवविलेयक विकल्प के रूप में नीम आधारित कीटनाशकों के निर्माण एवं प्रोन्नयन ” 2007-2009 विषय पर परियोजना जो रसायन व उर्वरक मंत्रालय द्वारा प्रायोजित है।
4. “ व्हाइट स्टेर्म बोरर के प्रतिरोधक अरेबिका पौधों का विकास ” 2010-2013 विषय पर डीबीटी द्वारा प्रायोजित बहु-संस्थागत जैव-प्रौद्योगिकी परियोजना ।
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सीसीआरआई तथा उसके सभी क्षेत्रीय केंद्रों के द्वारा उपजकर्ता समुदाय के समर्थन एवं लाभ के लिए निम्नलिखित सेवाएँ प्रदान की जाती हैं :
• सुधारित कॉफ़ी फसल पर प्रबंधकीय व पर्यवेक्षकीय संवर्ग के एस्टेट कार्मिकों को प्रशिक्षण
• रोपण सामग्रियों (बीज/क्लोन/उपरोप) के संशोधित प्रभेदों के उत्पादन एवं वितरण
• मृदा संशोधन, पोषक प्रबंधन तथा पोषण व पौधा संरक्षण के लिए प्रयुक्त गुणता परीक्षण के इनपुट्स पर विश्लेषिक एवं सलाहकारी सेवाएँ
• कीटाणुओं एवं रोगों के निवारण के लिए जैव-नियंत्रण कारकों के प्रवर्धन एवं वितरण
• कॉफ़ी क्षेत्र की समस्याओं के निराकरण के लिए क्षेत्र का निरीक्षण व सलहकारी सेवा
• बागानों के उत्पादन सुधारने के लिए प्रभार सिस्टम पर एस्टेट ग्रहण
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• कॉफ़ी गाइड – कॉफ़ी उपजकर्ताओं के लिए एक संदर्भ ग्रंथ
• कॉफ़ी अनुसंधान जर्नल - कॉफ़ी पर अनन्य वैज्ञानिक पत्रिका
• वार्षिक तकनीकी रिपोर्ट्स – अनुसंधान की प्रगति पर
• तकनीकी बुलेटिंस – विशिष्ट विषयों पर
• कॉफ़ी कृषि के सभी पहलुओं पर विस्तारक फ़ोल्डर्स/ लीफ़लेट्स – उपजकर्ताओं के बीच परिचालन के लिए
• सारसंग्रह, ग्रंथविज्ञान आदि जैसे प्रासंगिक प्रकाशन
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