भारतीय कॉफ़ी का परिचय ![]()
उपजाने की परिस्थितियाँ ![]()
महत्वपूर्ण प्रकार ![]()
विभिन्न क्षेत्र दर्शाता हुआ भारत का मानचित्र ![]()
उन्नतांश, वर्षापात आदि विषयों में विनिर्देशन के साथ क्षेत्र लॉगो ![]()
विशिष्ट कॉफ़ी ![]()
भारतीय कॉफ़ी , पेयों में अत्यंत असाधारण पेय है, जो मनमोहक विलक्षणता तथा उद्दीपक तीव्रता प्रदान करती है। भारत ऐसा एकमात्र देश है जहाँ सारी कॉफ़ी छायादार पेड़ों के नीचे उपजाई जाती है। यहाँ की कॉफ़ी विशेषतया, मृदु होती है और अधिक अम्लीय नहीं होती, इन कॉफियों में संपूर्ण असाधारण स्वाद तथा उत्तम सुगंध होते हैं।
भारतीय कॉफ़ी में एक अनोखी ऐतिहासिक महक भी है। ये सब लगभग चार सौ साल पूर्व एक लंबी कठिन यात्रा के साथ प्रारंभ हुआ, जब प्रसिद्ध संत बाबा बुदान सुदूरस्थ यमन से सात जादुई फलियाँ लाए और उन्हें कर्नाटक के चंद्रगिरि पहाडियों पर रोपा। आप प्रत्येक कॉफ़ी पीने के साथ उस अनोखी शुरुआत का संवेदन भारतीय कॉफ़ी के स्वाद, महक, आकार तथा अम्लीयता में अनुभव कर सकते हैं।
अक्सर यह कहा जाता है कि भारतीय कॉफ़ी के उपजकर्ता अपने फसल में अपनी जान डाल देते हैं। तब इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि भारत ने डेढ़ सौ वर्षों से भी अधिक समय के लिए उत्तम गुणता की कॉफ़ी के अनोखे प्रकार का निरंतर उत्पादन तथा निर्यात किया है।
भारत में सभी कॉफ़ी की संपूर्ण खेती उत्तम द्वि-स्तरीय मिश्रित छायादार पेड़ों के अधीन की जाती है जिनमें सदाबहार फलीदार पेड़ भी पाए जाते हैं। कॉफ़ी बागानों में लगभग 50 विभिन्न प्रकार के छायादार पेड़ पाए जाते हैं। छायादार पेड़ ढलवाँ धर्ती पर भूक्षरण रोकते हैं, वे मिट्टी की गहराई में जमे हुए पोषक तत्वों के पुनःचक्रण द्वारा मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं तथा तापमान के मौसमी परिवर्तन से कॉफ़ी पौधों को सुरक्षा प्रदान करते हैं और विभिन्न प्रकार के वनस्पति तथा जीवजंतुओं को अपने आँचल में बसा देते हैं।
भारत के कॉफ़ी बागान मौलिक मसालाओं का विशाल संसार भी है, मसाले एवं फल तथा काली मिर्च, इलायची, वैनिला, संतरा तथा केला जैसे अनेक फसलों के प्रकार कॉफ़ी पौधों के साथ उगाए जाते हैं।
भारत के कॉफ़ी उपजाने वाले क्षेत्रों की मौसमी परिस्थितियाँ विभिन्न होती हैं जो विभिन्न प्रकार की कॉफियों की खेती के लिए उपयुक्त है। अधिक उन्नतांश वाले कुछ क्षेत्र मृदु गुणता की अरेबिका कॉफ़ी के लिए उपयुक्त हैं जबकि गर्म आर्द्र परिस्थितियाँ रोबस्टा के लिए अत्यंत अनुकूल हैं।
| घटक | अरेबिका | रोबस्टा |
| मिट्टी | गहरी, उर्वर, जैव तत्वों से भरी, अधिक छनी हुई तथा हल्की अम्लीय (पी.एच 6.0-6.5) | अरेबिका के समान |
| ढ़लवाँ | हल्के से मध्यम स्तरीय ढलवाँ | हल्के ढलवाँ से समतलीय खेत |
| उन्नतांश | 1000-1500 मी. | 500-1000 मी. |
| पहलू | उत्तर, पूर्व और पूर्वोत्तर पहलू | अरेबिका के समान |
| तापमान | 150 से-250 से; ठंडा, समस्तरीय | 200 से - 300 से; गर्म, आर्द्र |
| सापेक्षिक आर्द्रता | 70-80% | 80-90% |
| वार्षिक वर्षापात | 1600-2500 मि.मी. | 1000-2000 मि.मी. |
| पुष्पण बौछार | मार्च- अप्रैल (25-40मि.मी.) | फरवरी-मार्च (25-40 मि.मी.) |
| समर्थक बौछार | अप्रैल-मई (50-75 मि.मी.) सुवितरित | मार्च-अप्रैल (50-75 मि.मी) सुवितरित |
केंट्स: केंट्स अरेबिका का प्राचीनतम विभेद है, जिसे 1920 के दशक में इसी नाम के एक अंग्रेज रोपक ने चुना था। रोपण समुदाय में अरेबिका का यह प्रकार, 1940 तक लोकप्रिय रहा, क्योंकि इस पर पत्ती किट्ट कम प्रभावकारी था। आजकल यह अधिक क्षेत्रों में नहीं उगाया जाता, पर अब भी यह अपनी विशिष्ट कप गुणता के कारण जाना जाता है।
एस.795 : - यह 1940 के दशक में उत्तम उपज, बड़ी फली, उच्चत्तम गुणता तथा पत्ती किट्ट के विरुद्ध अपेक्षित प्रतिरोधकता के साथ इसे जारी किया गया जो सबसे लोकप्रिय अरेबिका श्रेणी है। इस श्रेणी को अपनी उत्तम गुणता के लिए प्रसिद्ध ’केन्ट्स’ अरेबिका का प्रयोग करते हुए विकसित किया गया। आज भी एस.795 रोपकों के बीच लोकप्रिय है और सबसे अधिक खेती किए जाने वाला अरेबिका विभेद है। एस.795 में मोका के हल्के स्वाद के साथ संतुलित कप है।
कावेरीः काटीमोर के नाम से प्रचलित कावेरी, ’काटूरा’ और ’हाइब्रिडो-डी-टिमोर’ के बीच संकर श्रेणी है। काटूरा प्रचलित बोर्बोन विभेद का प्राकृतिक उद्भेदी है। अतः कावेरी ने काटूरा के उत्तम उपज एवं श्रेष्ठ गुणता की विशेषता तथा ’हाइब्रिडो-डी-टिमोर’ के प्रतिरोधी गुण को अपनाया है।
एस.एल.एन 9: सेलेक्शन 9 एथियेपियन अरेबिका संग्रह, ‘टफ़रिकेला’ तथा ‘हाइब्रिडो-डी-टिमोर’ के बीच की संकर श्रेणी है। एस.एल.एन 9 ने ’टफारिकेला’ के सभी श्रेष्ठ कप गुणता की विशिष्टता अपनाई है। कॉफ़ी की इस श्रेणी ने भारतीय कॉफ़ी बोर्ड द्वारा आयोजित ’फ्लैवर ऑफ इंडिया - कप्पिंग प्रतियोगिता-2002’ में सर्वोत्तम अरेबिका के लिए फ़ाइन कप अवार्ड जीता है।

भारत में कॉफ़ी उपजाने वाले क्षेत्रों को तीन विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत श्रेणीकृत किया जा सकता है : पारंपरिक क्षेत्र: |
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कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडू जैसे दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व करने वाले पारंपरिक क्षेत्र |
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देश के पूर्वी घाटों में स्थित आंध्रप्रदेश एवं उड़ीशा को सम्मिलित करते हुए गैर-पारंपरिक क्षेत्र |
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अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम,मणिपुर,नागालैंड ,मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए पूर्वोत्तर क्षेत्र |
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दक्षिण के कॉफ़ी बागान, भारतीय कॉफ़ी का पालना है। इनमें कर्नाटक का बाबा बुदान पहाड़ सम्मिलित है, जिसे भारतीय कॉफ़ी का जन्मस्थली माना जाता है। पूर्वी घाट एवं पूर्वोत्तर राज्य कॉफ़ी के नव-विकसित क्षेत्र हैं। | |||
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उन्नतांश : 1000-1400 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 900-1100 मी. एम एस एल |
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उन्नतांशः1000-1500 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 1500-2000 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 700-1200 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 750-1100 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 900-1100 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 900-1100 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 900-1400 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 600-2000 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 900-1500 मी. एम एस एल |
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उन्नतांश : 400-1600 मी. एम एस एल |
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वयनाड (केरल) : वयनाड, शूरता एवं साहस के प्रतीक भारत के राष्ट्रीय जानवर भारतीय बाघ का आवास स्थल है। |
उन्नतांश : 600-900 मी. एम एस एल |
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मानसूंड मलबार एए
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कई शताब्दियों से पूर्व, जब जहाज़ द्वारा यूरोप के लिए कॉफ़ी दाने का परिवहन कर रहा था तब एक ‘अनोखी घटना ’ हुई। मानसूनी हवा से दाने सूज गए, उनके रंग बदल गए तथा उन्हें सशक्त-मोहक स्वाद से पारखी प्राप्त हो गई। आजकल विश्वप्रसिद्ध विशिष्ट कॉफ़ी तैयार करने के लिए सर्वोत्तम अरेबिका बींस के मानसूनिंग द्वारा उसी जादू का पुनर्सृजन हो गया। |
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दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर स्थित क्यूरिंग वर्क्स में मानसूंड कॉफ़ी या कॉफ़ी दाने वायु की नमी से सूजे जाते हैं। उसके बाद उन्हें विशिष्ट भंडारणों में भंडारित करके कॉफ़ी बींस बैगों पर नमीयुक्त मानसूनी हवा परिचालित की जाती है तथा उन्हें अपेक्षित आकार प्राप्त कराते हुए अत्यंत रसीले स्वाद में परिवर्तित कराते हैं। इस प्रक्रिया से दाने पीले होकर उसकी अम्लता कम होती है तथा प्राचीन कॉफ़ी के सघन मोहक स्वाद में परिवर्तित होते हैं। मानसूंड कॉफ़ी तैयार करने के लिए केवल सूखे संसाधित अरेबिका एवं रोबस्टा दानों का ही उपयोग किया जाता है। स्वाद व तीखापन सुधारने तथा अधिक अम्लीय कॉफ़ी के लिए इन कॉफियों में ब्लेंड्स का उपयोग किया जाता है। मानसूंड कॉफ़ी की सर्वोत्तम श्रेणी का नाम मानसूंड मलबार एए है। |
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मैसूरु नग्गट्स एक्स्ट्रा बॉल्ड
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मैसूरु के चामुंडी हिल्स की अखंड नंदी बुल की मूर्ति की शक्ति व वैभव इन बड़े, सुगंधित अरेबिका बींस पर प्रतिबिंबित है, जो इस विरल, प्रीमियम विशिष्ट कॉफ़ी को विशेषज्ञों का मनपसंद कॉफ़ी बना देते हैं। |
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चिक्कमगलूर, कूर्ग, बिलगिरीस, बाबुदान गिरीस एवं शेवरोय्स के क्षेत्रों में उपजे साफ़ किए गए अरेबिका से ये अनोखे व स्वादिष्ट कॉफियाँ तैयार की गई हैं। इसके दाने अधिक बड़े एवं साफ चमकदार रूप के साथ समरूपी नीले-हरे रंग के हैं। इस कॉफ़ी कप में संपूर्ण महक, स्वास्थ्य वर्धक, उत्तम अम्लता, थोडे मसाले के साथ उत्कृष्ट स्वाद संयोजित हैं। यह दुर्लभ, प्रीमियम विशिष्ट कॉफ़ी है तथा भारत की सर्वोत्तम कॉफ़ी का प्रतिनिधित्व करती है। |
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रोबस्टा कापी रॉयाल
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अंबारी के साथ राज्य स्तरीय गज तथा मस्तक पर छत्र, फूलों तथा आभूषणों से सजे त्योहारीय जुलूस, भारतीय राष्ट्र-गौरव का प्रतीक है। गज के समरूपी यह विशिष्ट भारतीय ‘कापीस’ उत्तम गुणता के बोल्ड अरेबिका से तैयार की जाती है। |
कूर्ग, वयनाड, चिक्कमगलूरु ट्रावनकोर क्षेत्र के रोबस्टा पार्चमेंट एबी से यह कॉफ़ी बनाई जाती है। इसके दाने बडे, नुकीले सिरे के साथ गोल एवं भूरे से नीले-भूरे रंग के हैं। इसका कप संपूर्ण, मृदु, कोमल व रसीले स्वाद सुनिश्चित करता है। |
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